Sunday, July 27, 2014

Deepavali


Originally posted: October 26, 2011

I haven’t written anything for long. I am not writing anything new either. Just felt like sharing an old  poem, which some of you might have already heard.
फिर गयी है दीपावली
जगमग है हर घर, जगमग है हर गली|
इतनी रोशनी देखकर, रोशनी इतरा उठी
और बोली अंधेरे से, कि
अंधेरे अब बता, तेरा वजूद है कहाँ
अंधेरे ने कहा, रोशनी, मत इतनी इतरा
मै हूँ यहाँ, मैं हूँ वहां|
जरा देख उस अनाथ मासूम कि आँखों में,
उसके आँखों के अंधेरे को इस रोशनी से मतलब है क्या?
जरा देख उन बेघर भूखों को,
उनकी पेट की आग इन पटाखों से कम है क्या?
और अब देख इन रोशनी करने वाले दिलों में,
घृणा, द्वेष और ईर्ष्या, सब ही तो है यहाँ,
फिर कहाँ है इनमे रोशनी कीजगह|
अब बतारोशनी, तू है कहाँ?
मै हूँ यहाँ, मैं हूँ वहां|
तू है कहाँ, तू है कहाँ?
तुमने तो जलाये पटाखे, इनकी दीपक की औकात ना थी|
क्या गुनाह है आखिर उनका, जिनके चूल्हों में भी आग ना थी||

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